Tuesday, August 20, 2019

ऑस्ट्रेलिया में हुई जीयोग्रैफिक फ़ोटो प्रतियोगिता की तस्वीरें

हर साल ऑस्ट्रेलियाई जीयोग्रैफिक नेचर फ़ोटोग्राफ़र ऑफ़ द इयर प्रतियोगिता में कई चौंकाने वाली और जीव जगत से जुड़ी कई ख़ूबसूरत तस्वीरें देखने को मिलती हैं.
इसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, अंटार्कटिका और प्रशांत के कुछ द्वीपों से आने वाली तस्वीरों को चुना जाता है.
एक नज़र उन तस्वीरों पर जिन्हें इस साल विजेता चुनाा गया. विजेता तस्वीरों में जहां जलवायु परिवर्तन के संकट देखने को मिले, वहीं जीव जगत की मनमोहक तस्वीरें भी दिखीं.
वो चार अगस्त 2019 का दिन था. इस दिन पूरे कश्मीर में अफ़रातफ़री का माहौल था. लोग खाने-पीने की ज़रूरी चीज़ों को बाज़ार से इकट्ठा कर रहे थे.
पेट्रोल पंपों पर लोगों की लम्बी कतारें थीं. किसी को कुछ भी पता नहीं था कि कल कश्मीर में क्या होने वाला है.
लेकिन बीते दस दिनों से जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा था, उसे लेकर लोग इस बात पर सहमत थे कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है. अमरनाथ यात्रियों को सिक्योरिटी का हवाला देकर लौटने के लिए कहा जा रहा था. कश्मीर की फ़िज़ा में बेचैनी तो बरसों से महसूस होती है पर इस बार कुछ अलग था- क्या इसकी नब्ज़ पर हाथ रखना मुश्किल था.
मैं भी अपनी रिपोर्टिंग कर रहा था. तब मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट, लैंडलाइन फ़ोन बंद नहीं हुए थे. मैं अगले दिन यानी पांच अगस्त 2019 की सुबह के रेडियो प्रसारण के लिए रिपोर्ट तैयार कर रहा था.
रात के ग्यारह बज चुके थे और मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिए गए.
अब एक आख़िरी उम्मीद ब्रॉडबैंड और लैंडलाइन थी. देखते ही देखते रात के साढ़े बारह बज गए.
मैंने अपनी रिपोर्ट तैयार की और अब मेल करना बाक़ी था. ये उम्मीद थी कि मैं ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन से अपने दफ्तर रिपोर्ट मेल कर पाउंगा.
लेकिन पलक झपकते ही ब्रॉडबैंड इंटरनेट भी बंद हो गया. मैंने लैंडलाइन से दफ्तर फ़ोन करके सूचित किया कि इंटरनेट के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, इसलिए हम रिपोर्ट नहीं भेज सकते हैं. ऐसा लगा जैसे आप एक ऐसी दुनिया में हैं जहाँ बाहर की हवा तक दस्तक नहीं दे सकती.
अब ये फ़ैसला हुआ कि सुबह के प्रसारण में मुझसे लाइव लिया जाएगा. लेकिन सुबह तक लैंडलाइन भी बंद कर दिया गया था और सुबह की वो फ़ोन कॉल की घंटी आज तक नहीं बजी.
गौरतलब है कि अनुछेद 370 को हटाने से पहले क़रीब दस दिनों से सरकारी ऑर्डर्स आ रहे थे.
पहले ऑर्डर में कश्मीर में सुरक्षाबलों को संख्या बढ़ाने की बात कही गई. उसके बाद एक दूसरे ऑर्डर में तीन महीने राशन स्टॉक करने की बातें कही गईं.
तीसरे ऑर्डर में अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को कश्मीर छोड़ने के लिए कहा गया.
इन सब बातों ने कश्मीर में ख़ौफ़ का माहौल पैदा कर दिया.
अगले दिन यानी पांच अगस्त की सुबह छह बजे जब हम श्रीनागर के राजबाग, जहां हमारे दूसरे साथी एक होटल में रुके थे, जाने लगे तो घर से दो किलोमीटर की दूरी पर सेना कंटीले तार बिछा रही थी और लोगों को आगे बढ़ने से रोका जा रहा था.
मैं और मेरा ड्राइवर किसी तरह से श्रीनगर के राजबाग इलाके में सुरक्षाबलों और पुलिस के हर नाके को पार करते हुए पहुंच गए, जहां होटल में दिल्ली से आए हुए बीबीसी के कई साथी मेरा इंतज़ार कर रहे थे.
घर से होटल तक के 12 किलोमीटर के रास्ते में जगह-जगह सु रक्षा के सख़्त इंतज़ाम थे. जगह-जगह पर हमसे पूछताछ की गई.
होटल पहुंचने के बाद हम सभी साथी इस बात पर चर्चा करने बैठ गए कि हमें कैसे काम करना है. इस बात पर हम सब सहमत थे कि हमें चुनौतियों से निपटते हुए काम करना है.
पूरे दिन हमने श्रीनगर में हालत पर नज़र बनाए रखी और कुछ लोगों से हमारे दूसरे साथी बात करने में क़ामयाब भी रहे.
जब टीवी स्क्रीन्स पर ये ख़बर फ़्लैश हुई कि भारत की संसद में अनुच्छेद 370 को हटाने का प्रस्ताव पेश किया गया तो पूरा कश्मीर सकते में आया.
पांच अगस्त, 2019 की सुबह तक किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि भारत सरकार इतना बड़ा क़दम उठाने जा रही है.
कश्मीर में जहां-जहां नज़र जा सकती थी, वहां सिर्फ और सिर्फ पुलिस और सेना नज़र आ रही थी.

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